Virasat
Sunday, March 16, 2014
Maikade os bach ke nikalta he
कौन है कि जिसने मैं नहीं पि है.. मैकदे से जो बच के निकलता है
तेरी आँखों में डूब जाता हैं !
ख्वाब था शायद ख्वाब ही होगा !
माना कि तू मुझसे दूर है मगर तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तन्हा गुजरता है !
उलझा सा रहता हु तेरे ख्यालो में कि जैसे माले में धागा
तसवीरें बुलाती हैं मुझे कभी चाय पे तेरे साथ
मैं कहता हूँ गर्म तो वोह अश्क़ भी हैं जिन्हे रोज पिया करते हैं
कुछ और घोलकर पिलाओ तो बात हैं दावतनामे में !
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