Sunday, March 16, 2014

AAP Samne hain

आप सामने है तो हमें कुछ  याद नहीं .... वरना आप से हमें कुछ कहना जरूर था !

Raat ki Syaahi

 कभी कभी रात कि स्याही  कुछ ऐसे चेहरे पे जम सी जाती हे...
लाख रगड़ो सहर के पानी से लाख धोऊ
 मगर वोह कालख नहीं उतरती 
लोगी जब तुम पता चलेगा
  मैं और भी काला हो गया हु
मैं धुप में जलकर इतना क़ाला नहीं हुआ था !
 कि  जितना इस रात में सुलग कर सिया हु 

Ghalib

हर बात पे केहते हो के तू क्या है ....तुम्ही बता दो यह अंदाजे गुफ्तगू क्या हे 

Anamol

    जब तक बीका न था  तो कोई पूछता  न था. … तूने मुझे खरीद के अनमोल कर  दिया
 

Mausam ka jhonka

किसी मौसम का झोंका था जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी  कर गया हे
गए सावन में ये दीवारे यू सिली न थी न जाने इस दफा क्यों इनमे सीलन आ गयी हे
दरारे पड  गयी हे... और सीलन इस तरह बहती हे जैसे खुस्क रुखसारों  पे नीले आंसू  चलते है
न दिन होता है अब ना रात होती हे सभी कुछ रुक गया हे...
किसी मौसम का झोंका था जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी  कर गया हे  सी
 

Kitabein

किताबे झांकती है बंद अलमारी के सीसे से
 महीनो अब मुलाकात नहीं होती
 जो शामे  इनकी सोबतमें कटा करती  थी
 अब  गुजरती  है कंप्यूटर के पर्दो पर
 बड़ी बेचैन रहती है किताबे
मगर वोह जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
किताबे मागने ,गिरने उठने के बहाने रिस्ते बनते  थे  ...उनका क्या होगा 

Sama Har Rang ...

शमा हर रंग में जलती है  शहर होने तक !!

Ek Akela Is Sahar Mein ?

इन उम्र से लम्बी सड़कों को मंज़िल पे पहुंचते देखा नहीं
बस दौड़ती फिरती रहती  हैं हमने तो ठहरते देखा नहीं
इस अजनबी से शहर  में जाना पहचाना ढूंडता हैं एक अकेला इस शहर में  ?

Maikade os bach ke nikalta he

कौन है कि जिसने मैं नहीं पि है.. मैकदे से जो बच के निकलता है
तेरी आँखों में डूब जाता हैं !
 
ख्वाब था शायद  ख्वाब ही होगा !
माना कि तू मुझसे दूर है मगर तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तन्हा गुजरता है !
 उलझा सा रहता हु तेरे  ख्यालो में कि जैसे माले में धागा 
तसवीरें बुलाती हैं मुझे कभी चाय पे तेरे साथ
मैं कहता हूँ गर्म तो वोह अश्क़ भी हैं जिन्हे रोज पिया करते हैं
कुछ और घोलकर पिलाओ तो बात  हैं दावतनामे में !