Sunday, March 16, 2014

Mausam ka jhonka

किसी मौसम का झोंका था जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी  कर गया हे
गए सावन में ये दीवारे यू सिली न थी न जाने इस दफा क्यों इनमे सीलन आ गयी हे
दरारे पड  गयी हे... और सीलन इस तरह बहती हे जैसे खुस्क रुखसारों  पे नीले आंसू  चलते है
न दिन होता है अब ना रात होती हे सभी कुछ रुक गया हे...
किसी मौसम का झोंका था जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी  कर गया हे  सी
 

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