कभी कभी रात कि स्याही कुछ ऐसे चेहरे पे जम सी जाती हे...
लाख रगड़ो सहर के पानी से लाख धोऊ
मगर वोह कालख नहीं उतरती
लोगी जब तुम पता चलेगा
मैं और भी काला हो गया हु
मैं धुप में जलकर इतना क़ाला नहीं हुआ था !
कि जितना इस रात में सुलग कर सिया हु
लाख रगड़ो सहर के पानी से लाख धोऊ
मगर वोह कालख नहीं उतरती
लोगी जब तुम पता चलेगा
मैं और भी काला हो गया हु
मैं धुप में जलकर इतना क़ाला नहीं हुआ था !
कि जितना इस रात में सुलग कर सिया हु
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