Sunday, March 16, 2014

Raat ki Syaahi

 कभी कभी रात कि स्याही  कुछ ऐसे चेहरे पे जम सी जाती हे...
लाख रगड़ो सहर के पानी से लाख धोऊ
 मगर वोह कालख नहीं उतरती 
लोगी जब तुम पता चलेगा
  मैं और भी काला हो गया हु
मैं धुप में जलकर इतना क़ाला नहीं हुआ था !
 कि  जितना इस रात में सुलग कर सिया हु 

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