Sunday, March 16, 2014

Kitabein

किताबे झांकती है बंद अलमारी के सीसे से
 महीनो अब मुलाकात नहीं होती
 जो शामे  इनकी सोबतमें कटा करती  थी
 अब  गुजरती  है कंप्यूटर के पर्दो पर
 बड़ी बेचैन रहती है किताबे
मगर वोह जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
किताबे मागने ,गिरने उठने के बहाने रिस्ते बनते  थे  ...उनका क्या होगा 

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